प्रांतीय चुनाव (1937)
परिचय: 1937 के प्रांतीय चुनाव भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ थे। ये चुनाव 1935 के भारत शासन अधिनियम के तहत आयोजित किए गए, जो भारतीयों को प्रांतीय स्तर पर स्वायत्तता प्रदान करता था। इस चुनाव ने भारतीय राजनीति में प्रमुख दलों, विशेष रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच शक्ति संतुलन को स्पष्ट किया।
पृष्ठभूमि:
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1935 का भारत शासन अधिनियम:
- यह अधिनियम भारत में प्रांतीय स्वायत्तता की शुरुआत के लिए लाया गया था।
- भारतीयों को प्रांतीय विधानसभाओं में चुनाव लड़ने और सरकार बनाने का अधिकार दिया गया।
- केंद्र पर ब्रिटिश सरकार का पूरा नियंत्रण था, लेकिन प्रांतों में कुछ हद तक स्वशासन की अनुमति दी गई।
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राजनीतिक दलों की स्थिति:
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस:
- कांग्रेस ने चुनाव में व्यापक रूप से भाग लिया, लेकिन स्वायत्तता को स्वतंत्रता का विकल्प मानने से इनकार किया।
- इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को चुनौती देना था।
- मुस्लिम लीग:
- यह पार्टी मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा और पृथक निर्वाचक मंडल की मांग को लेकर सक्रिय थी।
- मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रही थी।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस:
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चुनाव प्रक्रिया:
- चुनाव 11 प्रांतों में हुए।
- केवल सीमित संख्या में भारतीयों को मतदान का अधिकार था (लगभग 10-12% जनसंख्या)।
- यह अधिकार संपत्ति, शिक्षा और कर योग्यता के आधार पर दिया गया था।
चुनाव परिणाम:
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कांग्रेस की जीत:
- कांग्रेस ने 11 में से 7 प्रांतों में स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया।
- यह भारत के इतिहास में पहली बार था जब कांग्रेस ने इतनी व्यापक सफलता हासिल की।
- प्रमुख प्रांत: मद्रास, बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रांत, और बॉम्बे।
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मुस्लिम लीग का प्रदर्शन:
- मुस्लिम लीग का प्रदर्शन कमजोर रहा।
- यह केवल कुछ मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में ही प्रभावशाली साबित हो सकी, जैसे बंगाल और पंजाब।
- जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को महसूस किया।
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अन्य दल:
- स्वतंत्र दल, क्षेत्रीय पार्टियां और रियासतों के प्रतिनिधियों ने भी कुछ सीटें जीतीं।
चुनाव के बाद की स्थिति:
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कांग्रेस सरकारों का गठन:
- कांग्रेस ने 7 प्रांतों में सरकार बनाई:
- मद्रास, बॉम्बे, बिहार, उड़ीसा, संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश), मध्य प्रांत, और सीपी एंड बरार।
- इन सरकारों ने भारतीय जनता के लिए कई सुधारवादी नीतियां लागू कीं, जो ब्रिटिश शासन के अधीन संभव थीं।
- कांग्रेस ने 7 प्रांतों में सरकार बनाई:
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मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया:
- मुस्लिम लीग को प्रांतों में सत्ता से बाहर रहना पड़ा।
- कांग्रेस की व्यापक जीत ने मुस्लिम लीग को चिंतित किया, क्योंकि इसका असर भारतीय राजनीति में मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर पड़ा।
- मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम बहुल प्रांतों में कांग्रेस के रवैये की आलोचना की और मुसलमानों को पृथक राष्ट्र की आवश्यकता का प्रचार करना शुरू किया।
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कांग्रेस की नीतियां:
- किसानों और मजदूरों के हितों के लिए कानून बनाए गए।
- शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार लाए गए।
- भूमि सुधार की दिशा में प्रयास किए गए।
- राजनीतिक कैदियों की रिहाई की गई।
ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस के बीच संबंध:
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कांग्रेस और ब्रिटिश शासन का टकराव:
- प्रांतीय स्वायत्तता के बावजूद ब्रिटिश गवर्नर के पास व्यापक शक्तियां थीं।
- कांग्रेस सरकारें गवर्नरों के हस्तक्षेप से नाराज थीं और इसे स्वायत्तता का उल्लंघन मानती थीं।
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गवर्नरों की शक्तियां:
- गवर्नर को विधेयकों को रोकने और उन्हें वीटो करने का अधिकार था।
- ब्रिटिश सरकार ने स्वायत्तता के नाम पर नियंत्रण बनाए रखा।
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ब्रिटिश शासन के खिलाफ विरोध:
- कांग्रेस ने स्वराज की मांग जारी रखी और प्रांतीय स्वायत्तता को स्वतंत्रता का विकल्प मानने से इनकार कर दिया।
मुस्लिम लीग का पुनर्गठन:
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जिन्ना का नेतृत्व:
- 1937 के चुनावों के बाद मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम लीग को पुनर्गठित किया और इसे मुस्लिम समुदाय का एकमात्र प्रतिनिधि संगठन बनाने का प्रयास किया।
- उन्होंने "दो राष्ट्र सिद्धांत" का प्रचार तेज किया।
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कांग्रेस और लीग के बीच मतभेद:
- मुस्लिम लीग ने कांग्रेस सरकारों पर मुसलमानों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया।
- यह आरोप कांग्रेस और लीग के बीच संबंधों को और खराब कर गया।
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लीग का विस्तार:
- मुस्लिम लीग ने 1940 में लाहौर प्रस्ताव के माध्यम से पाकिस्तान की मांग को औपचारिक रूप दिया।
प्रांतीय चुनाव का महत्व:
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भारतीय जनता में राजनीतिक जागरूकता:
- यह पहला मौका था जब भारतीय नेताओं ने प्रांतीय स्तर पर स्वायत्त सरकारों का नेतृत्व किया।
- चुनावों और सरकार के गठन ने भारतीय जनता में राजनीतिक भागीदारी और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाई।
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कांग्रेस का प्रभाव:
- कांग्रेस ने अपनी सत्ता के माध्यम से जनता के लिए कई सुधार किए, जिससे उसकी लोकप्रियता और अधिक बढ़ी।
- कांग्रेस ने राष्ट्रीय आंदोलन को प्रांतीय स्तर पर मजबूत किया।
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मुस्लिम लीग की रणनीति:
- चुनावों में असफलता के बाद मुस्लिम लीग ने अपने संगठन को पुनर्गठित किया।
- मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम समुदाय के लिए एक पृथक राष्ट्र की आवश्यकता का प्रचार करना तेज कर दिया।
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ब्रिटिश शासन पर प्रभाव:
- प्रांतीय स्वायत्तता ने ब्रिटिश शासन की सीमाओं को उजागर किया।
- यह स्पष्ट हुआ कि भारतीय नेताओं के नेतृत्व में शासन संभव है और स्वतंत्रता की मांग को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कांग्रेस सरकारों का इस्तीफा (1939):
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द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि:
- 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत के साथ ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं से परामर्श किए बिना भारत को युद्ध में शामिल कर दिया।
- कांग्रेस ने इसका विरोध किया और अपने प्रांतों में सरकारों से इस्तीफा दे दिया।
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मुस्लिम लीग का लाभ:
- कांग्रेस सरकारों के इस्तीफे के बाद मुस्लिम लीग ने इस स्थिति का राजनीतिक लाभ उठाया।
- जिन्ना ने इस दिन को "डे ऑफ डिलीवरेंस" (मुक्ति दिवस) के रूप में मनाने का आह्वान किया, जिससे कांग्रेस और लीग के बीच तनाव और बढ़ गया।
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ब्रिटिश रणनीति:
- ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के प्रभाव को कम करने के लिए मुस्लिम लीग और अन्य दलों को समर्थन दिया।
- "फूट डालो और राज करो" की नीति और तेज हो गई।
निष्कर्ष:
1937 के प्रांतीय चुनाव भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ थे। इन चुनावों ने भारतीय राजनीति में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व को स्थापित किया और प्रांतीय स्तर पर स्वशासन के प्रयोग का पहला अवसर प्रदान किया। हालांकि, चुनावों ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच गहरे मतभेद को भी उजागर किया, जो आगे चलकर भारत के विभाजन का कारण बना। कांग्रेस सरकारों ने जनता के लिए कई सुधार किए, लेकिन ब्रिटिश गवर्नरों की शक्ति और द्वितीय विश्व युद्ध ने प्रांतीय स्वायत्तता की सीमाओं को स्पष्ट कर दिया। प्रांतीय चुनावों ने भारतीय राजनीति को स्वतंत्रता के संघर्ष की ओर और मजबूती से अग्रसर किया और भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की नींव को मजबूत किया।