सविनय अवज्ञा आंदोलन और गांधी-इरविन समझौता
परिचय: सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख चरण था। यह आंदोलन महात्मा गांधी के नेतृत्व में 1930 में शुरू हुआ और इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के अन्यायपूर्ण कानूनों का पालन न करके स्वराज की मांग को बल देना था।
सविनय अवज्ञा आंदोलन:
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पृष्ठभूमि:
- नेहरू रिपोर्ट (1928): इसमें भारतीयों के लिए डोमिनियन स्टेटस की मांग की गई थी, जिसे ब्रिटिश सरकार ने अस्वीकार कर दिया।
- लाहौर अधिवेशन (1929): कांग्रेस ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में पूर्ण स्वराज (Complete Independence) की घोषणा की।
- 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया।
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दांडी मार्च (मार्च 1930):
- 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम से दांडी तक 240 मील लंबी यात्रा शुरू की।
- उद्देश्य: ब्रिटिश सरकार के नमक कानून का विरोध।
- 6 अप्रैल 1930 को गांधीजी ने दांडी में समुद्र के किनारे नमक बनाकर कानून का उल्लंघन किया।
- यह आंदोलन सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत का प्रतीक बना।
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मुख्य उद्देश्य:
- नमक कानून का उल्लंघन।
- विदेशी वस्त्रों और ब्रिटिश सामान का बहिष्कार।
- करों का भुगतान न करना।
- अन्यायपूर्ण कानूनों का शांतिपूर्ण विरोध।
आंदोलन का विस्तार:
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आंदोलन की प्रमुख घटनाएं:
- नमक कानून का उल्लंघन:
- गांधीजी और उनके अनुयायियों ने समुद्र तट पर नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा।
- पूरे भारत में लोगों ने नमक बनाने और ब्रिटिश कानून का विरोध करने का अभियान चलाया।
- कर भुगतान का विरोध:
- किसानों ने जमीन का लगान देने से इनकार कर दिया।
- ब्रिटिश सरकार की आय में गिरावट आई।
- नमक कानून का उल्लंघन:
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महिलाओं की भूमिका:
- महिलाओं ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
- उन्होंने नमक बनाने, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करने और सभाओं का नेतृत्व करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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ब्रिटिश सरकार का दमन:
- सरकार ने आंदोलनकारियों पर कठोर दमनकारी नीतियां लागू कीं।
- महात्मा गांधी सहित कई नेताओं को जेल भेजा गया।
- नमक बनाने वालों पर जुर्माना लगाया गया और संपत्तियों को जब्त किया गया।
आंदोलन के प्रभाव:
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राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन:
- आंदोलन ने देश के सभी हिस्सों में लोगों को एकजुट किया।
- यह पहली बार था जब आंदोलन में ग्रामीण और शहरी, महिलाएं और पुरुष, सभी वर्गों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
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ब्रिटिश शासन पर प्रभाव:
- आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को हिला दिया और प्रशासन पर दबाव बनाया।
- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को मान्यता मिली।
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गांधीजी का प्रभाव:
- गांधीजी का अहिंसा और सत्याग्रह का संदेश विश्व स्तर पर चर्चा का विषय बना।
- उनका नेतृत्व स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य आधार बन गया।
गांधी-इरविन समझौता (मार्च 1931):
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पृष्ठभूमि:
- सविनय अवज्ञा आंदोलन और ब्रिटिश दमन के बाद, दोनों पक्षों ने समझौते के लिए बातचीत की।
- ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन की तीव्रता और गांधीजी के प्रभाव को समझते हुए बातचीत की पेशकश की।
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मुख्य बिंदु:
- ब्रिटिश सरकार:
- भारतीयों को नमक बनाने की अनुमति दी।
- सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा किया (जिन पर हिंसा के आरोप नहीं थे)।
- भारतीयों को समुद्र के किनारे नमक बनाने का अधिकार दिया।
- महात्मा गांधी:
- सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित करने का वादा किया।
- कांग्रेस ने गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने की सहमति दी।
- ब्रिटिश सरकार:
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महत्व:
- यह पहला अवसर था जब ब्रिटिश सरकार ने गांधीजी और कांग्रेस को एक समान प्रतिनिधि के रूप में मान्यता दी।
- गांधीजी का नेतृत्व राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुदृढ़ हुआ।
गांधी-इरविन समझौता के बाद की स्थिति:
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गोलमेज सम्मेलन (1931):
- गांधीजी ने कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करते हुए लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया।
- सम्मेलन में गांधीजी ने भारत में पूर्ण स्वराज की मांग उठाई।
- लेकिन इस सम्मेलन में भारतीयों की मांगों को अनदेखा किया गया और कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।
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आंदोलन की पुनः शुरुआत (1932):
- गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद गांधीजी भारत लौटे।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन को फिर से शुरू किया गया।
- ब्रिटिश सरकार ने आंदोलनकारियों पर और कठोर दमन किया, और हजारों सत्याग्रहियों को गिरफ्तार किया गया।
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अल्पसंख्यक मुद्दा और सांप्रदायिक विभाजन:
- ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों के बीच "फूट डालो और राज करो" की नीति को तेज किया।
- अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की घोषणा ने कांग्रेस और अन्य समुदायों के बीच विभाजन को गहरा किया।
आंदोलन और समझौते का महत्व:
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राष्ट्रीय एकता का प्रदर्शन:
- सविनय अवज्ञा आंदोलन ने भारतीयों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ एकजुट किया।
- यह स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण चरण बना, जिसमें हर वर्ग ने भाग लिया।
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ब्रिटिश शासन पर दबाव:
- आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को गंभीरता से लेने पर मजबूर किया।
- गांधी-इरविन समझौते के माध्यम से पहली बार कांग्रेस को एक राष्ट्रीय प्रतिनिधि संगठन के रूप में मान्यता मिली।
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गांधीजी का बढ़ता प्रभाव:
- गांधीजी का नेतृत्व राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सशक्त हुआ।
- उनकी अहिंसा और सत्याग्रह की नीति ने स्वतंत्रता संग्राम को एक नैतिक आधार दिया।
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सीमित उपलब्धियां:
- गांधी-इरविन समझौते ने नमक कर को समाप्त नहीं किया और भारतीयों की कई प्रमुख मांगों को अनदेखा किया गया।
- ब्रिटिश सरकार की "फूट डालो और राज करो" नीति ने सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा दिया।
निष्कर्ष:
सविनय अवज्ञा आंदोलन और गांधी-इरविन समझौता भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण चरण थे। सविनय अवज्ञा आंदोलन ने भारतीय जनता को संगठित कर ब्रिटिश शासन के खिलाफ एकजुट किया। गांधीजी के नेतृत्व में आंदोलन ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को पहचान दिलाई। हालांकि, गांधी-इरविन समझौते ने कुछ सीमित उपलब्धियां दीं, लेकिन यह स्वतंत्रता संग्राम में बातचीत और अहिंसक संघर्ष की शक्ति को दर्शाता है। सविनय अवज्ञा आंदोलन और गांधी-इरविन समझौते ने भारत को स्वतंत्रता के करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नैतिक और राजनीतिक आधार को मजबूत किया।